जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
यह कविता विनोद कुमार शुक्ल की रचना है, जिसमें उन्होंने उन लोगों और स्थानों के प्रति अपनी इच्छा व्यक्त की है जो उनके जीवन में कभी नहीं आएंगे। कवि कहते हैं कि वे उन लोगों से मिलने खुद उनके पास जाएंगे, चाहे वो लोग उनके घर कभी न आएं। यह कविता जीवन की उन जटिलताओं और सरलता के बीच के संघर्ष को दर्शाती है, जहाँ व्यक्ति अपने जीवन में उन चीजों की तलाश करता है जो उसे कभी नहीं मिलीं। कवि नदी, पहाड़, खेत और गाँव की बात करते हैं, जो उनके जीवन में कभी नहीं आएंगे, लेकिन वे खुद उन तक पहुँचने की कोशिश करेंगे। यह कविता हमें यह सिखाती है कि हमें अपने जीवन में उन चीजों की तलाश करनी चाहिए जो हमें खुशी देती हैं, भले ही वे हमारे पास न हों।
| Word | Hindi میں | سادہ (Hindi) | Pron. |
|---|---|---|---|
| उफनती | बहती | जो तेज़ी से बह रही हो | ufanati |
| चट्टानें | पत्थर | बड़े पत्थर | chattaan |
| असंख्य | बहुत सारे | गिनती से बाहर | asankhya |
| खेत-खलिहानों | खेती के स्थान | जहाँ खेती होती है | khet-khalihanon |
| फ़ुरसत | आराम | खाली समय | fursat |
| आख़िरी | अंतिम | जो सबसे अंत में हो | aakhiri |
| इच्छा | चाहत | मन की चाह | ichchhaa |
विनोद कुमार शुक्ल एक प्रमुख हिंदी कवि और लेखक हैं। उनका साहित्यिक कार्य आधुनिक हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देता है। उनकी कविताएँ और कहानियाँ सरल भाषा में गहरी भावनाओं को व्यक्त करती हैं।
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