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यूं ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करोYun hi besabab na phira karo, koi shaam ghar bhi raha karo
``` यूं ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो वो गज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो
अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा तुम्हें जिनसे दिल ने भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो
मुझे इश्क़तर-सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियां जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो
कभी हंसने पढ़ा नहीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में जो मैं बन संवर के कहीं चलूं मेरे साथ तुम भी चला करो
नहीं बेहिजाब² वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर न हो उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है ये तुम्हारे घर का बहार है इसे आँसुओं से हरा करो ```
बिना वजह यहाँ वहाँ मत घूमो, कभी शाम को घर भी रहो वह गज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके से पढ़ा करो
कोई हाथ नहीं मिलाएगा, अगर तुम जल्दी गले मिलोगे यह नया शहर है, थोड़ा फासले से मिला करो
अभी रास्ते में कई मोड़ हैं, कोई आएगा, कोई जाएगा जिन्हें दिल ने भुला दिया है, उन्हें भूलने की दुआ करो
ये मोहब्बतों की कहानियाँ मुझे इश्क़तर लगती हैं जो कहा नहीं, वो सुनो, जो सुना नहीं, वो कहो
कभी हंसने का मौका नहीं मिला, थोड़ा आशिक़ाना लिबास पहन लो अगर मैं सज-धज के कहीं चलूं, तो तुम भी मेरे साथ चलो
वह चाँद जैसा बेहिजाब नहीं है कि नज़र का कोई असर न हो उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से देर तक मत देखो
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाल में उदास पेड़ के पास है ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो