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और तुम—aur tum-
और तुम—
कई ओस की बूँदों से एक अक्षर मैंने दिल की आँच में लिखा।
उस काँच में तुम्हारे पसंदीदा फूलों से सजाकर एक आईना बनाया।
हर वक़्त उसके सामने खड़े होकर बस तुम्हें ख़्वाबों के बादलों में मिलता रहा।
किसी और ही जहाँ में तुम्हें रोककर दिल के ख़तों का हाल सुनाना— हर दास्तान अब तुमसे ही शुरू होती है।
फिर तुम्हें घर बुलाना।
तुम्हारे साथ बादलों में बैठकर उस हीरे को देखना—
और फिर हर बात भूल जाना।
अब हर ओस की बूँद में बस तुम्हारा ही अक्षर लिखना।
और तुम—
कई ओस की बूँदों से एक अक्षर मैंने दिल की गर्मी में लिखा।
उस काँच में तुम्हारे पसंदीदा फूलों से सजाकर एक आईना बनाया।
हर समय उसके सामने खड़े होकर सिर्फ तुम्हें सपनों के बादलों में पाता रहा।
किसी और ही दुनिया में तुम्हें रोककर दिल के पत्रों का हाल सुनाना— हर कहानी अब तुमसे ही शुरू होती है।
फिर तुम्हें घर बुलाना।
तुम्हारे साथ बादलों में बैठकर उस हीरे को देखना—
और फिर हर बात भूल जाना।
अब हर ओस की बूँद में सिर्फ तुम्हारा ही अक्षर लिखना।