أَوَمَا عَلِمْتَ لِيُوْمِ بَعثِكَ مَشهْدًا
تتحدث هذه القصيدة للشاعر أحمد شوقي عن أهمية العلم والإيمان في حياة الإنسان، حيث يبدأ الشاعر بتوجيه سؤال استنكاري "أَوَمَا عَلِمْتَ لِيُوْمِ بَعثِكَ مَشهْدًا"، مما يشير إلى أهمية يوم القيامة وما يحمله من مشاهد. في البيت الثاني، يوضح الشاعر أن الفرار من الأقارب سيكون سمة من سمات ذلك اليوم، مما يعكس حالة من القلق والخوف من الحساب.
ثم ينتقل الشاعر إلى ذكر نصيحة من شخص حكيم، مما يدل على أهمية الاستماع إلى النصيحة والتمسك بالعلم. ويعبر عن ندمه على تركه علم قومٍ راشدين، مما يعكس شعورًا بالذنب والافتقار إلى المعرفة. في الأبيات التالية، يتحدث الشاعر عن الجهل الذي يسيطر على بعض الناس، ويحثهم على العودة إلى أصول سعيهم في هذه الحياة.
تتجلى في القصيدة مشاعر الحزن والندم، حيث يشير الشاعر إلى أن الكمد أشد من الندم، مما يعكس عمق الألم الذي يشعر به. كما يستخدم الشاعر مجموعة من الصور البلاغية مثل الاستعارة والتشبيه، حيث يشبه الجهد بالكسعي الذي غمّ تبلدًا، مما يبرز مدى الضياع الذي يشعر به.
تدعو القصيدة إلى التضرع للخالق والاعتماد على رحمته، حيث يطلب الشاعر من الله أن يمنحه الدراية والنجاة من الجهل. في النهاية، يختتم الشاعر بالصلاة على النبي محمد وآله، مما يعكس مكانة النبي في قلوب المسلمين وأهمية الدعاء له.
| Word | In Arabic | Plain (Arabic) | Pron. |
|---|---|---|---|
| أَوَمَا | هل | أداة استفهام تدل على الاستنكار. | awama |
| عَلِمْتَ | عرفت | فعل ماضٍ يدل على المعرفة. | alimta |
| لِيُوْمِ | في يوم | حرف جر يدل على الزمان. | liyawmi |
| بَعثِكَ | قيامك | اسم يدل على البعث. | ba'thika |
| مَشهْدًا | موقفًا | مكان يشهد فيه الأحداث. | mashhadan |
| فِيهِ | فيه | حرف جر يدل على المكان. | fihi |
| الْفِرارُ | الهروب | اسم يدل على الهروب. | al-firaru |
| مِنَ | من | حرف جر يدل على المصدر. | mina |
| الأَقَارِبِ | الأقارب | أقرباء الشخص. | al-aqaribi |
| سَيِّدا | سيدًا | شخص ذو مكانة عالية. | sayyidan |
| وَذَكَرتَ | تذكرت | فعل ماضٍ يدل على التذكر. | wadhakarta |
| نُصحَاً | نصيحة | إرشاد أو توجيه. | nushan |
| مِن | من | حرف جر يدل على المصدر. | min |
| لَبِيبٍ | حكيم | اسم يدل على الذكاء. | labibin |
| أَخلَصَ | أخلص | فعل ماضٍ يدل على الإخلاص. | akhlasa |
| وَنَدِمتَ | ندمت | فعل ماضٍ يدل على الندم. | wanadimta |
| تَركَكَ | تركت | فعل ماضٍ يدل على الفراق. | taraktaka |
| عِلْمَ | علم | معرفة أو دراسة. | ilm |
| قَوْمٍ | قوم | مجموعة من الناس. | qawmin |
| رَاشِدَا | راشد | شخص حكيم. | rashidan |
| يَا | يا | أداة نداء. | ya |
| مَنْ | من | اسم موصول. | man |
| نَسِيتَ | نسيت | فعل ماضٍ يدل على النسيان. | nasi'ta |
| أُصُولَ | أصول | أسس أو قواعد. | usula |
| سَعْيِكَ | سعيك | جهدك أو عملك. | sa'yika |
| فِي | في | حرف جر يدل على المكان. | fi |
| الدُّنَا | الدنيا | الحياة. | al-dunya |
| جَهْلًا | جهل | عدم المعرفة. | jahlan |
| بِشِرعَةِ | بشرعة | بموجب الشريعة. | bishir'ati |
| ذِي | ذي | اسم موصول. | dhi |
| الجَلالِ | الجلال | العظمة. | al-jalali |
| فَقَد | فقد | فعل يدل على الفقد. | faqad |
| بَدا | ظهر | فعل يدل على الظهور. | bada |
| كَمدًا | كمد | حزن أو ألم. | kamadan |
| أَشَدَّ | أشد | أكثر حدة. | ashadda |
| النَّدُومِ | الندم | شعور بالندم. | al-nadumi |
| مُضَيِّعًا | مضيع | شخص يهدر الفرص. | mudai'yan |
| جُهدًا | جهد | عمل أو جهد. | juhdan |
| كَمَا | كما | مثل. | kama |
| الكُسَعِيُّ | الكسعي | اسم يدل على شخص. | al-kusaiyy |
| غُمَّ | غم | حزن. | ghumma |
| تَبَلَّدا | تبلد | فعل يدل على الفتور. | taballada |
| فَتَزَوَّدَنْ | فتزوّد | اجمع. | fatazawwad |
| لِلْحَشْرِ | للحشر | يوم القيامة. | lil-hashri |
| عِلمًا | علماً | معرفة. | ilmana |
| بِالَّذي | بالذي | بما. | bil-ladhi |
| يُرْضِي | يرضي | يجعل راضيًا. | yurdi |
| الإِلَهَ | الإله | الرب. | al-ilaha |
| بِهَدْيِ | بهدي | بالتوجيه. | bi-hadi |
| أَحْمَدَ | أحمد | اسم النبي محمد. | ahmada |
| أَقْتَدَى | اقتدى | اتبع. | aqtada |
| لَا | لا | أداة نفي. | la |
| تَنْتَبِذْ | تنأى | تبتعد. | tantabidh |
| بِهَوًى | بهوا | بشغف. | bi-hawa |
| يُدَانِي | يداني | يقترب. | yudani |
| مَن | من | اسم موصول. | man |
| فَجَر | فجر | فعل يدل على الفجور. | fajra |
| وَيَظُنُّ | ويظن | يعتقد. | wayadhunnu |
| أَنَّه | أنه | ضمير يعود على الفاعل. | annahu |
| بِالفُنُونِ | بالفنون | بالمهارات. | bil-fununi |
| تفَرَّدَا | تفرد | تميز. | tafarrada |
| فَتَضَرَّعَنْ | فتضرع | تضرع. | fata-darra'a |
| لِلخَالِقِ | للخالق | لله. | lil-khaliqi |
| الرَّحْمَـٰنِ | الرحمن | اسم من أسماء الله. | ar-rahmani |
| أَو | أو | أداة تفصيل. | aw |
| قُلْ | قل | فعل أمر. | qul |
| أَيْ | أي | أداة استفهام. | ay |
| إِلَهِي | إلهي | ربي. | ilahi |
| لِعَبْدٍ | لعبد | للخادم. | li-abdin |
| أَسوَدَا | أسود | ذو لون داكن. | aswada |
| سَادِت | سادت | سيطرت. | sadit |
| فُؤَادَهُ | فؤاده | قلبه. | fu'adahu |
| ظُلْمَةُ | ظلمة | حالة من العتمة. | dhulmat |
| الكُرُبَاتِ | الكربات | الأحزان. | al-kurubat |
| بَل | بل | أداة توكيد. | bal |
| آثامُهُ | آثامه | ذنوبه. | athamu |
| كَانَت | كانت | فعل ماضٍ يدل على الوجود. | kanat |
| سَوَادًا | سواد | لون داكن. | sawadan |
| سَائدَا | سائد | مسيطر. | sayidan |
| يَرَى | يرى | يشاهد. | yara |
| مَا | ما | اسم موصول. | ma |
| بِالفُؤَادِ | بالقلب | في القلب. | bil-fu'adi |
| وَيَسمَعُ | ويسمع | يستمع. | waysma'u |
| وَإِلِيْهِ | إليه | إلى الله. | wa-ilayhi |
| أَدْعُو | أدعو | أطلب. | ad'u |
| بِالسُّهَادِ | بالسهاد | بالسهر. | bi-suhadi |
| وَمُنشِدا | ومنشداً | مغنياً. | wa-munshidan |
| هَب | هب | أعط. | hab |
| لِي | لي | حرف جر يدل على الملكية. | li |
| بِرَحمَتِكَ | برحمتك | بركة من الله. | bi-rahmatika |
| الدِرَايَةَ | الدراية | المعرفة. | al-dirayah |
| مَهرَبًا | مهربًا | ملجأ. | maharban |
| كُلِّ | كل | جميع. | kulli |
| جهلٍ | جهل | عدم المعرفة. | jahl |
| تَمَادَى | تمادى | استمر. | tamada |
| وَٱعْتَدَى | واعتدى | تجاوز. | wa-a'tada |
| خَزَائِنُ | خزائن | مخازن. | khazainu |
| رِزقِهِ | رزقه | ما يرزق به. | rizqihi |
| قَوْلِ | قول | كلام. | qawl |
| كُنْ | كن | فعل أمر. | kun |
| حِفَاظًا | حفاظ | حماية. | hifazhan |
| لِلعُلُومِ | للعلوم | للمعرفة. | lil-ulumi |
| مُجَوِّدا | مجودًا | متميزًا. | mujawwidan |
| ثُمَّ | ثم | أداة ترتيب. | thumma |
| الصَّلَاةُ | الصلاة | عبادة. | al-salatu |
| عَلَى | على | حرف جر يدل على الاتجاه. | ala |
| النَّبِيِّ | النبي | رسول الله. | al-nabi |
| وَآلِهِ | وآله | وأسرته. | wa-alihi |
| خَيرِ | خير | أفضل. | khayri |
| البَرَيَّةِ | البشر | الناس. | al-bariyyati |
| حَامِدًا | حامدًا | مسبحًا. | hamidan |
| وَمُحَمَّدا | ومحمدًا | اسم النبي. | wa-muhammadan |
أحمد شوقي علي أحمد شوقي (1285- 1351 هـ / 1868- 1932 م) هو شاعر وكاتب مسرحي مصري، يُعد من أشهر شعراء العربية في العصر الحديث، لقِّب بـ «أمير الشعراء».
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