وَلَيْتَ غَائِبَةَ الشَّمْسَينِ لَمْ تَغِبْ
تتناول هذه القصيدة للمتنبي موضوع الحب والفراق، حيث يعبر الشاعر عن ألمه وحنينه للشخص الذي يحبه. يبدأ الشاعر بتعبير عن أمنيته في أن لا تغيب الشمس، مما يعكس شعورًا بالفقد. في البيت الثاني، يتمنى أن تتذكره المحبوبة عندما تغيب، مما يدل على عمق مشاعره.
في الأبيات التالية، يتحدث عن كيف أن حبه يجعل النجوم تبدو صغيرة مقارنة بمشاعره، ويصف الأماني التي تُنشر دون عائق، مما يعكس قوة الحب وتأثيره. يتحدث أيضًا عن كيف أن يديه المتكسرة تلقي سرابًا خلف السحب، مما يعكس شعورًا بالضياع والحنين.
تتطور المشاعر في القصيدة من الحزن إلى الأمل، حيث يتحدث عن عيون المحبوبة وكيف أنها تشبه الثور في السلم، مما يدل على القوة والجمال. في النهاية، يشير إلى ساعة جلت فيها نفوسهم، مما يعكس لحظة من الصفاء والسكينة.
تتميز القصيدة باستخدام المجازات والتشبيهات القوية، مثل تشبيه عيون المحبوبة بالثور، مما يضفي عمقًا على المعاني. كما أن استخدامه للغة الشعرية الغنية يعكس مهارته كأحد أعظم شعراء العرب. تعكس القصيدة أيضًا الأجواء الثقافية والسياسية في عصره، حيث كان الشعراء يستخدمون كلماتهم كوسيلة للتعبير عن مشاعرهم وأفكارهم في زمن الاضطرابات.
| Word | In Arabic | Plain (Arabic) | Pron. |
|---|---|---|---|
| وَلَيْتَ | أتمنى | تعبير عن الرغبة في شيء | walayta |
| غَائِبَةَ | مفقودة | غير موجودة | ghaa'ibah |
| الشَّمْسَينِ | الشمسين | مصدر الضوء | ash-shamsayn |
| لَمْ | لم | تنفي الفعل | lam |
| تَغِبْ | تغيب | تختفي | taghib |
| فَتذْكُرِينِي | فتتذكريني | تتذكريني | fata dhkurīni |
| إذَا | عندما | في حال | idhā |
| عَزَعَتْ | غابت | ابتعدت | ʿazʿat |
| لمَا | عندما | في الوقت الذي | lamā |
| دُبُرَتْ | غابت | ابتعدت | dubarāt |
| وَأنتِ | وأنتِ | أنتِ | wa anti |
| التي | التي | التي | allatī |
| بِهَوَاكِ | بحبك | بسبب حبك | bi-hawāk |
| أُزِيحُ | أزيح | أبعد | uzīḥu |
| النُّجُومَ | النجوم | الأجرام السماوية | an-nujūm |
| مَفَاتِيحَ | مفاتيح | أدوات الفتح | mafātīḥ |
| الأمنية | الأماني | الرغبات | al-umnīyah |
| نُشِرَتْ | نُشرت | تم نشرها | nushirat |
| دُونَ | بدون | من غير | dūn |
| طَعِينٍ | عائق | حاجز | ṭaʿīn |
| فَهَيَّاكَ | فها أنا | ها أنا | fa-hayāk |
| أَلْقَى | ألقي | أضع | alqā |
| مِنَهَا | منها | منها | minhā |
| أَدَايَ | يدي | يدي | adāy |
| مُفَكَّسَةً | متكسرة | مكسورة | mufakkasah |
| سَرَابًا | سراب | وهم | sarāb |
| خَلَفَ | خلف | وراء | khalaf |
| السُّحبِ | السحب | الغيوم | as-suḥb |
| تَشُدُّ | تشدد | تجذب | tashudd |
| مُعَزّقَةً | معززة | مدعومة | muʿazzaqah |
| مدَامُ | يا مدام | يا سيدتي | madām |
| عيني | عيني | عيني | ʿaynī |
| تَومَا | في النوم | أثناء النوم | tawma |
| النِّيَامَى | النوم | النوم | an-nayāmā |
| عِندَ | عند | في | ʿinda |
| الَنَوَمِ | النوم | النوم | an-nawam |
| أَيْضًا | أيضًا | كذلك | ayḍan |
| يَغْتَضَضِ | يختفي | يقل | yaghtaḍiḍ |
| من | من | من | min |
| ضياءٍ | الضوء | النور | ḍiyā' |
| إلى | إلى | نحو | ilā |
| خِضَرٍ | خضار | الأخضر | khidhr |
| مِنْ | من | من | min |
| دَمَوِي | دموي | مرتبط بالدم | damawī |
| مِنْهُمَا | منهما | منهما | minhumā |
| يُحَاكي | يحاكي | يماثل | yuḥākī |
| أَنْ | أن | لكي | an |
| تبدو | تبدو | تظهر | tabdū |
| عيُونَكَ | عيونك | عينيك | ʿuyūnaka |
| كَالثُّورِ | كالثور | مثل الثور | ka-thūr |
| فِي | في | داخل | fī |
| سِلِمَةٍ | سلم | سلام | silmah |
| ساعة | ساعة | وقت | sāʿah |
| جَلَتْ | جلت | ظهرت | jalat |
| نَفُوسَا | نفوسنا | أرواحنا | nafūsā |
| بحمدَةٍ | بحمد | بمدح | bi-ḥamdah |
| كلَّما | كلما | كلما | kullamā |
| تَفَوَّهْتُ | تحدثت | نطقت | tafawwahtu |
| نجوًّا | نجوى | همس | najwā |
| غيرَ | غير | ليس | ghayra |
| خَفِيٍّ | خفية | مخفية | khafiyy |
أبو الطيب المتنبي هو شاعر عربي بارز وُلد في الكوفة عام 915 م وتوفي عام 965 م. يُعتبر من أعظم شعراء العرب، حيث تميز بشعره الحكيم وقوة تعبيره.
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