Loading
अपनी कविता को पढ़करApni kavita ko padhkar
अपनी कविता को पढ़कर इस तरह जीना सीख गया हूँ—
हर आँसू को फ़र्श पर गिरने से रोकना…
इस तरह, जैसे अगर वो गिर गया तो प्यास की ज़मीन पर नदी किनारे खड़ी आशिक़ और माशूक़ के पहले घर की मिट्टी टूट जाएगी।
जैसे एक आँसू गिरा तो वो दोनों दो हिस्सों में बँट जाएँगे—
जैसे चाँद और तारे अलग कर दिए जाएँ, और क़यामत आ जाए।
दुनिया के ख़त्म होने की ख़बर शायद बस एक छोटे-से आँसू से ही आए…
इसलिए उसे रोक लो।
थोड़ा वक़्त निकालो— अपनी माशूक़ा को गजरा पहना दो, उसकी मनपसंद बिंदी लगा दो, उसके पैरों का सारा दर्द अपने हाथों में ले लो…
और जीते-जी जन्नत पा लो—
दुनिया के ख़त्म होने से पहले अपनी दुनिया बचा लो।
अपनी कविता को पढ़कर मैंने जीने का नया तरीका सीख लिया है—
हर आँसू को ज़मीन पर गिरने से रोकना…
ऐसे, जैसे अगर वो गिरा तो सूखी ज़मीन पर नदी किनारे खड़े प्रेमी और प्रेमिका के पहले घर की मिट्टी टूट जाएगी।
जैसे एक आँसू गिरा तो वो दोनों अलग हो जाएँगे—
जैसे चाँद और तारे अलग हो जाएँ, और प्रलय आ जाए।
दुनिया के ख़त्म होने की ख़बर शायद सिर्फ एक छोटे आँसू से ही आए…
इसलिए उसे रोक लो।
थोड़ा समय निकालो— अपनी प्रेमिका को फूलों का गजरा पहना दो, उसकी पसंदीदा बिंदी लगा दो, उसके पैरों का सारा दर्द अपने हाथों में ले लो…
और जीते-जी स्वर्ग पा लो—
दुनिया के ख़त्म होने से पहले अपनी दुनिया बचा लो।